सुस्वागतम् - जी आयां नूं

"संस्कृति सरोकार" पर पधारने हेतु आपका आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु'

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

18 अगस्त जन्म दिन पर विशेष

दिल में ऐसे संभालते हैं ग़म,

 जैसे ज़ेवर संभालता है कोई.....

0 सुरजीत मान

बिमल राय जिन्हें उनके दोस्त और शागिर्द प्यार और श्रद्धा से ‘बिमल दा’ कहते थे, उनकी 1957 में बनी मशहूर फ़िल्म ‘बंदिनी’ से दो पंजाबी कलाकारों ने हिन्दी फ़िल्मों में क़दम रखा। एक, लुधियाने के समीप डांगों के सुंदर, शर्मीले और सुडौल धर्मेन्द्र जिन्होंने इस क्लासिक फ़िल्म में बहुत ही मुख़्तसर परंतु शिद्दत से भरपूर डॉक्टर देवेन की भूमिका निभाई, जो जेल में उम्र कैद की सज़ा काट रही कल्याणी से अमर और अनाम प्यार करता है और हार कर फ़िल्म और उसकी ज़िंदगी से सदा के लिए विदा हो जाता है। दूसरा था, शाहबाद मारकंडा के पास का संज़ीदा, शालीन कवि गुलज़ार जिसे इस फ़िल्म में सिर्फ़ एक गीत लिखने का मौक़ा मिला था, परंतु वैष्णव भक्ति के रंग में रंगे उस गीत ने रातो-रात गुलज़ार को एक विलक्षण पहचान और हस्ताक्षर बना दिया। वह गीत था ‘मोरा गोरा अंग लईले, मोहे श्याम रंग दई दे, छुप जाऊंगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे।’ दरअसल फ़िल्म के संगीतकार ऐस. डी. बर्मन को यह पसंद नहीं था। अन्य सभी गीत शैलेन्द्र जैसे स्थापित गीतकारों द्वारा लिखे जाने थे। उस के मुकाबले एक नया-नया पंजाब से आया ‘पगड़ी वाला छोरा’ क्या मायने रखता था। बिमल दा की जज्बा ती ज़िद के आगे आख़िर बर्मन ख़ामोश रह गए और बिमल दा का विश्वास सच साबित हुआ जब गुलज़ार रचित गीत समूची फ़िल्म का सबसे मंहगा श्रृंगार बन गया। बहुत ही कम गीतकारों की क़िस्मत ऐसी होती है जिनका सफ़र शिखर से ही शुरू होता है। यह थी गुलज़ार की भाग्यशाली शुरूआत।

गुलज़ार बहुपक्षीय कलाकार हैं परंतु वे चाहे फ़िल्म निर्देशित कर रहे हों, स्क्रिप्ट लिख रहे हों या संवाद पिरो रहे हों, दिल से वे शायर ही होते हैं। जब उन्होंने फ़िल्मों में क़दम रखा, गीतों की महफ़िल में सबसे आधिक बोलबाला साहिर, शकील, मजरूह, हसरत जयपुरी, शैलेंद्र, इंदीवर, राजिन्द्र कृष्ण, कैफ़ी आज़मी का था। इन महारथियों के होते हुए भी गुलज़ार एक नए सुर, रंग और लय वाली शायरी से उदय हुए। सुंदरता यह भी है कि उन्होंने अपना वही ‘शुद्ध काव्यात्मक’ रूप आज तक कायम रखा है। टैगोर की भाँति उनका गद्य भी अति काव्यात्मक और वाक्यों में कम, मिसरों में ज़्यादा लिखा होता है। यूँ लगता है कि वे सोचते और महसूसते भी काव्य में ही हैं। इस का सटीक उदाहरण उनकी आडियो कैसेट 'फुरसत के रात दिन है’ जिस में अपने चुनिंदा गीतों से पहले वे गद्य में उन के बारे संक्षेप में जानकारी देते हैं जैसे 'बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी से बेवफ़ाई’ से पहले की ये कुछ पंक्तियां :

‘लाख क़समें दी, लालच दिये, मगर जाने वाले लौटे नहीं सिर्फ़ राहों पर उड़ता हुआ गुबार छोड़ गए। कब तक कोई सन्नाटे फाँकता रहे ज़िंदगी तो चलती ही रहती है, गिले रह जाते हैं या वफ़ाओं पर झुके हुए सिजदे, कि कोई आवाज़ दे ।’ इसी तरह मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है के विषय में ये बानगी :

‘किनारे दूर होते हुए बहुत दूर हो गए, वक्त की छपाड़ों में गुम गए। हाथ से अंगूठी उतारी, कंगन उतारे, सात फेरों के साथ लौटा दिए। मगर उन का क्या होगा जो ज़ेवर दिल में रख लिए हैं। दिल में ऐसे संभालते हैं ग़म, जैसे ज़ेवर संभालता है कोई।’

गुलज़ार की शायरी महज़ शब्दों में नहीं लिखी होती बल्कि सटीक बिंबों में पेश की गई होती है। कई बार तो सारी की सारी न ज़म या गीत बिंब ही होता है जिस का पूरा आनंद उठाने के लिए पाठक को ‘दिल’ के अतिरिक्त ऑंखों का भी इस्तेमाल करना पड़ता है। जैसे ‘दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन’ में सिर्फ़ मतला ग़ालिब का है और बाकी सभी बिंबों की लड़ी। ‘गर्मियों की रात को, पुरवईया चले। ठंडी सफ़ेद चादर पर जागें देर तक तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए....।’ या ‘सर्दियों की धूप और, आंगन में लेट कर ऑंखों पे खींच कर तेरे दामन के साये को औंधे पड़े रहे यूं ही करवट लिए हुए...।’ इसी तरह ऑंधी फ़िल्म के गीत ‘तेरे बिना कोई शिकवा तो नहीं.... ’ की ये पंक्तियां – ‘जी में आता है तेरे दामन में सर छुपा के हम रोते रहें, रोते रहें, तेरी भी ऑंखों में ऑंसुओं की नमी तो नहीं.... तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं....तेरे बिना ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी नहीं....।’

गुलज़ार की रचनाएं - फ़िल्में, संवाद, कहानियां और सबसे ऊपर शायरी - मानवीय रिश्तों के उन पलों को पकड़ती हैं, उन मंज़रों का चित्रण करती हैं जिनका नामकरण अगर असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल ज़रूर है। ये वो रिश्ते हैं जिनका शिखर टैगोर, शरत चंद्र और बिमल मित्र की कहानियां या उपन्यास हैं। चाहे वे परिचय, किनारा, इजाज़त, लेकिन, मेरे अपने, ऑंधी, मौसम या माचिस जैसी फिल्में बना रहे हों, या आनंद, ख़ामोशी या ख़ुशबू के संवाद लिख रहे हों और या कोई ‘रोज़ अकेली जाए, चाँद कटोरा लिए भिखारिन रात’ जैसी न ज़म और ‘और मुख़्तसर सी बात है, तुमसे प्यार है’ जैसा गीत लिख रहे हों वे किसी न किसी मानवीय रिश्ते में रंग भर रहे होते हैं। निम्नलिखित पंक्तियां जो उनके गीत – ‘हमने देखी है इन ऑंखों की महकती ख़ुशबू’ से हैं, के माध्यम से रिश्तों के प्रति उनके दृष्टिकोण और परिभाषा को समझा जा सकता है :

‘प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं, एक ख़ामोशी है सुनती है, कहा करती है, न ये रुकती है न ठहरती है कभी, नूर की बूँद है सदियों से बहा करती हैं। सिर्फ़ अहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो '

यही रिश्ता बदल-बदल कर अलग-अलग परतों में उन की फ़िल्मों में नज़र आता है। ‘मेरे अपने’ में एक हारी, तिरस्कृत बूढ़ी औरत उन के मुहल्ले के लड़ाके, बागी लड़कों में अपनी छड़ी ढूँढती है। ‘मौसम’ में एक उदास आशिक अपनी प्रेमिका की तलाश में अपनी ही बेटी से जा मिलता है। ‘ऑंधी’ जो हिन्दी लेखक कमलेश्वर की रचना पर आधारित है, पति-पत्नी के ऊपर से बिखराव परंतु भीतर से जुड़े रिश्ते की गाथा है।

इजाज़त जिसे एक लंबी कविता का फ़िल्मांकन ही कहा जा सकता है, महबूबा और पत्नी के प्यार में पिघल रहे, पिस रहे, पति का द्वंदमयी दुखांत है। यहाँ तक कि ‘माचिस’ जिसे एक फ़िल्मी दस्तावेज़ कहा जा सकता है, भी एक राजनीतिक विषय को मानवता के स्तर पर पेश करती हैं। यह उन दिनों की गाथा है जब पंजाब कोई पिछले जन्म के पापों का संताप और शाप झेल रहा था। वास्तव में इसकी जड़ समाज था जिसने कुछ खुद्दार आत्माओं को, अपनी प्रेयसियों की मरमरी बाँहों को अलविदा कह कर बंदूकें उठाने के विए मजबूर कर दिया। परिणाम वही निकला जो सदियों से निकलता आ रहा है -

धीरे-धीरे जीती दुनिया, धीरे-धीरे हारे लोग।


‘माचिस’ के विषय में मैं खुश्वंत सिंह के कुछ प्रभाव प्रस्तुत किए बिना नहीं रह सकता। वे ‘ऊपर चढ़कर पुकारते रहे हैं कि हिंदी फ़िल्मों में वे कभी पूरे तीन घंटे नहीं बैठ सके परंतु माचिस पहली फ़िल्म थी जो उन्होंने पूरी देखी और बहुत बार मानवता की व्यर्थ तबाही और बर्बादी पर ऑंखें भी भर आईं। इस फ़िल्म के दो ‘कोरस’ विलक्षण ही नहीं बल्कि हिंदी फ़िल्मों के लिए नए भी थे। इनमें गुलज़ार की शायरी का बिंब संयोजन भी शिखर को स्पर्श करता है। इसके पक्ष में साक्षी के तौर पर कुछ पंक्तियां ही पर्याप्त होंगी :



‘जहाँ तेरे कदमों के कंवल गिरा करते थे,
हँसे तो दो गालों में भंवर पड़ा करते थे,
तेरी कमर के बल से नदी मुड़ा करती थी,
तेरी हँसी को सुनकर फसल पका करती थी,
छोड़ आए हम वो गलियां....।’


‘चुन्नी लेके सोती थी कमाल लगती थी,
पानी में जलता चिराग लगती थी।’

 माचिस के बारे में गुलज़ार के अपने विचार कुछ यूं हैं :

‘इसमें दिखाया गया है कि किस तरह निरीह लड़के आतंकवाद के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। वे एक ही परिवार के पाँच लड़के थे। अंत में उनमें से कोई भी नहीं बचा और सभी अपनी ही गोलियों से ख़त्म हो गए। किसी हद तक यह वही हिंसा है जिसका वहशी नाच गुलज़ार ने 1947 के विभाजन के वक्त ऑंखों से देखा था जब वह युवावस्था की दहलीज़ की ओर अग्रसर ‘दीना’ गाँव का लगभग पंद्रह वर्षीय किशोर था।’

पिछले दिनों दिल्ली में उनके कहानी संग्रह ‘रावी पार’ पर एक गोष्ठी आयोजित की गई थी। इस का समर्पण ‘for Rakhee, the longest short story of my life’ अपने आप में एक कविता है। इस संग्रह की ‘ख़ौफ़’ जैसी कहानियां उस ‘दर्दनाक विभाजन’ के जख़्मों के विषय में है, जिनके बारे में लेखक ऐसा महसूस करता है : ‘Something like a festering wound, that stricks like a sore thumb. Which can neither be healed nor exorcised. What is this something? The scars of partition.’ यह सब कुछ याद करते हुए वे ऑंखों में आ गए ऑंसुओं को छुपाते हुए, भर्राई सी आवाज़ से, एक अजीब कंपन से गुज़रते हुए कभी छत तो कभी हाथ की लक़ीरों की तरफ देख रहे थे। गुज़रे दिनों और पीछे छूट गए अपनों की याद में गुमसुम वे कुछ गुनगुनाने से लगे। ‘फिर ये तो जो इन ऑंखों ने देखा है, भुलाया नहीं जा सकता। परछाईयों की भाँति मेरे साथ रहता है, र ातों को आकर डराता है, मेरी ऑंखों मे झाँकता है....मेरा ‘मुल्क़’ वो है और मेरा ‘वतन’ यही सदमा मेरा पीछा नहीं छोड़ता।

कई आलोचकों और पाठकों को यह गिला है कि गुलज़ार के रचना संसार में विचार अंश (Thought content) नाम मात्र है। जावेद अख़्तर और निदा फाज़ली के विपरीत। उनकी (गुलज़ार) सारी शायरी अस्थूल से संबंधित है, स्थूल से नहीं। कई बार तो यह ‘कला कला के लिए’ का दम भरती प्रतीत होती है। दरअसल गुलज़ार किसी वाद से नहीं जुड़े, सिर्फ़ अपने दिल के भीतर मुँह नीचा करके देखते रहे हैं और जो नज़र आया उसे कलमबद्ध करते रहे हैं। उनकी अपनी कविता ‘वो जो शायर था’ उनके भीतर के कवि का संकल्प प्रस्तुत करती प्रतीत होती है -

‘वो जो शायर था चुप सा रहता था,

बहकी-बहकी सी बातें करता था,

ऑंखें कानों पर रखकर सुनता था,

खामोशियों की आवाज़ें,

रात को उठ कर कोहनियों के बल,

चाँद की ठुड्डी चूमा करता था,

चाँद से गिरकर मर गया है वो।’


उनकी कविता का कैप्सूल प्रतीक हैं ये दो पंक्तियां –

‘हवाओं पे लिख दो, हवाओं के नाम,

हम अनजान परदेसियों का सलाम।’


गुलज़ार जन्म से पंजाबी है, कर्म से बंगाली। यहाँ तक कि दिखने में भी, सिवाए उनकी तिल्लेदार जूतियों के सब कुछ टैगोर की धरती का है जिस की घुट्टी और रंगत उन्हें बिमल दा, हेमंत कुमार, ऋषिकेष मुखर्जी, असित सेन और बासु भट्टाचार्य की संगत के कारण नसीब हुई और जिसे उन्होंने आज तक संभाल कर रखा है। दरअसल वे पैदा हुए पाकिस्तान में, युवा हुए पंजाबियों में और कलाकार बने बंगालियों की सोहबत में। उनकी शायरी की ज़मीन और स्वभाव पूरी तरह बंगला है। फिर भी कई बार पूरी तरह विशुद्ध पंजाबी शब्द जैसे बीबी, चूल्हा, सिरा, चिमटा, हवेली, रसोई, मोई और चुन्नी उनके अवचेतन में पंजाबी भाषा का सबूत दे देते हैं। ‘माचिस’ के ‘चप्पा-चप्पा चरखा चले’ कोरस की दूसरी पंक्ति ‘पौनी-पौनी आरी आ तेरी बौनी-बौनी बेरियों तले’ पंजाबी लोक बोलियों में आती है जिस में कुछ शब्दों का उच्चारण हरिहरण और साथियों के लिए मुश्किल हो गया था। यहाँ तक कि जितेन्द्र जैसे नाचने-कूदने वाले अभिनेता को ‘किनारा’ और ‘परिचय’ में बदल कर अपना रूप दे दिया और उन पर ये बंगाली खासे का गीत भी फ़िल्माया :

साहिलों पे रहने वाले ये सुना तो होगा कहीं

कागज़ों की कश्तियों का कोई किनारा होता नहीं।

अपनी फ़िल्मों के बारे में उनकी सूक्ष्मता और गंभीरता का एक ही प्रमाण काफ़ी है कि उन्होंने ‘कोशिश’ में दिलीप कुमार से सिर्फ़ एक पंक्ति ‘अरे भाई तुम तो मुझसे भी आहिस्ता बोलते हो’ बुलवाने में कितना ज़ोर लगाया था। वे इस कुछ क्षणों के दृश्य को फ़िल्म की उपलब्धि मानते हैं।

बी. आर. चोपड़ा ने महाभारत की प्रस्तुति द्वारा दूरदर्शन के दर्शकों पर जो अहसान किया वैसा ही गुलज़ार ने मिर्ज़ा गालिब धारावाहिक बना कर समूचे विश्व पर किया। नसीर-उद्दीन जैसे महान कलाकार के माध्यम से ग़ालिब को जीवंत कर दिया और जगजीत के माध्यम से उसकी गज़लों में एक विलक्षण सुंदरता और रंग भर दिया। धारावाहिक की ग़ज़लों की ऑडियो कैसेट के परिचय में अपने शब्दों और बोलों के माध्यम से गालिब की फकीराना जीवन शैली को अति संक्षिप्त रूप में सजीव कर दिया- ‘बेमारा मुहल्ले की वो पेचीदा दलीलों सी गलियां, चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट से पर्दे, इस बेनूर अंधेरी सी गली आज़म से, एक तरतीब चरागों की शुरू होती है, एक फदायिन सुखन का सफ़ा खुलता है, असद उल्लाह खाँ गालिब का पता मिलता है।’

अगर अब तक की हिन्दी फ़िल्मों के दुखांत शहंशाह (ट्रेजेडी किंग) होने का ख़िताब दिलीप कुमार को हासिल है तो दुखांत बेगम (ट्रेजेडी क्वीन) का मुकुट मीना कुमारी के शीश पर सजा। महान अभिनेत्री होने के साथ - साथ वे अपनी ही किस्म की शायरा भी थी जिस का गवाह है उनका एक मात्र ऐल. पी. ‘I Recite : I Sing’ जिसे खैय्याम ने संगीत से सजाया। जब वे तिल-तिल ख़त्म हो रहीं थीं तो उन्होंने रोने के लिए जो दो कंधे तलाशे वे दो पंजाबियों के ही थे। धर्मेन्द्र और गुलज़ार के। दुनिया से सदा के लिए विदा होने से पहले वे अपनी डायरी के बिखरे पन्ने गुलज़ार को दे गईं जो उन्होंने ‘उनतालीस मील लंबी मौत’ शीर्षक से संपादित किए। (स्मरण रहे मीना कुमारी का उनतालीस वर्ष की उम्र में निधन हुआ)। उनके लिए एक मर्सिया भी लिखा जिस की चंद पंक्तियां इस प्रकार है:

गिरा दो पर्दा कि दास्तां खाली हो गई है,

गिरा दो पर्दा कि खूबसूरत उदास चेहरे,

कहीं खिलाओं में गुम गए हैं,

गरीब ऑंखों से रूठ कर एक-एक ऑंसू उतर गया है,

आवाज़ें अपने सुरों से उठ कर चली गई हैं, गिरा दो पर्दा....।


मीना कुमारी की नज़्म में एक पंक्ति है – ‘आगाज़ तो होता है, अंजाम नहीं होता। जब मेरे फसाने में एक नाम नहीं होता।’ इसी तरह, प्रसंग बेशक भिन्न है, गुलज़ार की शायरी की बात भी उनके चहेते गायक भूपेन्द्र के बिना अधूरी है। माना, उनकी नज़्में और गीत जगजीत, लता और किशोर कुमार जैसों ने डूब कर गाए हैं और शोहरत के शिखर पर भी पहुँचे परंतु जो रंग इनमें भूपेन्द्र की भारी और भरी-भरी आवाज़ भरती है उस की बात ही कुछ और है। लगता है जैसे भूपेन्द्र की आवाज़ बनी ही गुलज़ार की रचनाओं के लिए हो। ‘एक अकेला इस शहर में’, ‘दिल ढूंढता है फिर वही’, ‘वो जो शायर था’ जैसे गीतों का किसी और गायक की आवाज़ में कल्पना लगभग असंभव है।

कई तख़ल्लुस बड़ी मनोरंजक बहस का विषय बने रहते हैं और गुलज़ार भी इसी कबीले से बावस्ता हैं। जब पद्मभूषण सम्मान के लिए (जून 2004) संपूरन सिंह नाम पुकारा गया तो कई दर्शक हैरान से रह गए। दरअसल उर्दू, हिन्दी शायरी की दहलीज़ पर कदम रखने से पूर्व गुलज़ार, संपूरन सिंह ‘गुलज़ार’ नाम से पंजाबी कहानियां लिखा करते थे। फिर धीरे-धीरे वे ऐस. ऐस. गुलज़ार बन गए और अंतत: सिर्फ़ गुलज़ार ही रह गए। ज्यों-ज्यों भीतरी शायर बड़ा और विकसित होता गया, नाम छोटा ही नही, संक्षिप्त होता गया। शायरी की आत्मा भी तो संक्षिप्तता ही होती है।

एक बार अमृता प्रीतम ने फैज़ अहमद से पूछा कि वे पंजाबी में क्यों नहीं लिखते। फैज़ का जवाब था, लिख तो लूं पर वारिस शाह से डरता हूँ। ये एक महान कवि की वारिस शाह को श्रद्धांजलि थी, सलाम था। बेशक वारिस पंजाबी ही नही, भारतीय साहित्य में एक विलक्षण हस्ताक्षर हैं। गुलज़ार भी इन दिनों इस महान कवि के बारे में फ़िल्म बनाने का अपना बहुत पुराना सपना साकार करने के विषय में सोच रहे हैं. इस विलक्षण फ़िल्म की शूटिंग रावी की दोनों तरफ होगी, क्योंकि ‘उस पार’ गुलज़ार का ‘मुल्क़’ है और इस पार ‘वतन’ ।


भावुक कोलाज सी इस लेखनी को खुद गुलज़ार के अहसासनुमा विचारों से समेटा जा रहा है, जो वे कविता, ख़ास तौर से गीतों की संरचना के बारे महसूस करते हैं-



‘गीत बूढ़े नहीं होते, उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ती। वे चलते रहते हैं, पलते रहते हैं। सुनने वालों की जब उम्र बदल जाती है, तो वे कहते हैं पहाड़ का वो टीला जब बर्फ़ं को बादलों से ढक जाया करता था, वहाँ से एक आवाज़ सुनाई दिया करती थी। बस कुछ ऐसी आवाज़ों की याद हुआ करते हैं गीत। बेशक यह परिभाषा शायरी के समूचे और असीम सौंदर्य को अपने आगोश में समेटने का दावा नहीं कर सकती, फिर भी यह गुलज़ार-काव्य के भिन्न आधार-प्रबंध को, जिस के प्रवाह पर वे मुसलसिल दरबानी रहे हैं, अभिव्यक्त ज़रूर करती है और यही भिन्नता उनकी विलक्षणता है।’



पंजाबी से अनुवाद : नीलम शर्मा ‘अंशु’
साभार – पंजाबी ट्रिब्यून














1 टिप्पणी:

  1. सुंदर प्रस्तुति!

    हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।

    उत्तर देंहटाएं