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"संस्कृति सरोकार" पर पधारने हेतु आपका आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु'

शनिवार, मार्च 07, 2015

शक्ति को अपनी ज़रा पहचान लो। (कविता)।

दोस्तो, बस आधे घंटे बाद तारीख बदल जाएगी और कल की तारीख यानी 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस के नाम दर्ज है। इस मौके पर प्रस्तुत है 
श्री वीरेंद्र राय (वरिष्ठ राजभाषा प्रबंधक, इंडियन बैंक,  विशाखपट्टनम्) द्वारा रचित कविता 
'शक्ति को अपनी ज़रा पहचान लो' 
आपके समक्ष प्रस्तुत है : - 




सोमवार, मार्च 02, 2015

दो दशकों का सफ़र .........


कोलकाता की नैशनल लाइब्रेरी ने साहित्य से जुड़ने विशेष रूप से बंगाल की माटी में रहते हुए मातृभाषा पंजाबी के साहित्य से जुड़ने का अवसर दिया। शुक्रगुज़ार हूँ कि कोलकाता शहर ने नीलम शर्मा को नीलम शर्मा अंशु बनाया। 21 मार्च को इस कोलकाता शहर में 26 बरसों का सफ़र पूरा हो जाएगा। लगता है जैसे कल की ही बात हो।

जून 2015 में साहित्यिक अनुवाद कार्य से जुड़े मुझे 21 वर्ष पूरे हो जाएंगे। 1994 जून में यह सफ़र शुरू हुआ था। बस छिटपुट कहानियों और आलेखों के अनुवाद से। फिर 1997 में करतार सिंह दुग्गल साहब का उपन्यास पढ़ा, फुल्लां दा साथ। इस उपन्यास ने कुछ ऐसा छाप छोड़ी कि उसे हिंदी में  अनूदित करने का निश्चय किया। अनुवाद के लिए दुग्गल साहब से संपर्क करने पर उन्होंने यह कहते हुए सहमति दे दी कि वैसे तो मैं अपनी रचनाओं के अनुवाद खुद ही करता हूँ परंतु पता नहीं इसकी बारी कब तक आए। तुम करना चाहती हो तो मेरी तरफ से इजाज़त है। अनुवाद कार्य पूर्ण कर प्रकाशन हेतु दुग्गल साहब को ही भेज दिया। चूंकि वे दिल्ली में रहते थे तो प्रकाशकों से संपर्क करने में सुविधा रहेगी उन्हें यह सोचकर। उन्होंने पहले किसी प्रकाशन संस्थान को दिया फिर वापस लिया इस तरह एक दो जगहों पर विलंब होता देख उन्होंने पुन: वापस लेकर इसे अंतत:  शिलालेख प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। यह कार्य 2000 में हो पाया। यानी तीन सालों का वक्त प्रकाशन में ही बीत गया। उसके बाद संयोग से ही इकबाल माहल रचित पुस्तक पढ़ी सुरां दे सौदागर तो लगा कि इसे तो हिन्दी में ही होना चाहिए था ताकि उन शख्सीयतों के बारे में सभी तक जानकारी पहुंचे। बस, इसी तरह सिलसिला चल निकला। फिर इसी श्रृंखला में नाम जुड़ा काबुलीवाले की बंगाली बीवी का। अनुवाद हेतु अनुमति के लिए सुष्मिता बंद्योपाध्याय से संपर्क किया। वे एक ही बात पर अड़ी रहीं कि मुझे तीस हज़ार रुपए चाहिए। उन्हें बड़ी मुश्किल से कन्विन्स किया कि पहले आप इजाज़त तो दें प्रकाशक आपको पैसे देगा। ख़ैर एक पुस्तक की बात की थी परंतु राजकमल प्रकाशन ने उनकी अन्य दो पुस्तकों का भी करार कर लिया उनसे। इस तरह काबुली वाले की बंगाली बीवी के बाद तालिबान अफ़गान और मैं, एक अक्षर भी झूठा नहीं  नाम भी इस क्रम में जुड़ गए। काबुलीवाले की बंगाली बीवी 2002 के कोलकाता पुस्तक मेले की हिन्दी पुस्तकों में बेस्ट सेलर रही।

       अब तक 21 वर्षों  के इस सफ़र में पंजाबी और बांगला से हिन्दी में, हिन्दी से पंजाबी, बांगला से पंजाबी आदि यानी कुल मिलाकर 16 पुस्तकों का अनुवाद कर चुकी हूँ जिनमें से 13 प्रकाशित हो चुकी हैं और तीन प्रकाशनीधीन हैं। फुल टाइम केंद्र सरकार की नौकरी करते हुए साथ-साथ शौकिया तौर पर विगत 16-17 वर्षों से एफ. एम. आकाशवाणी पर बतौर रेडियो जॉकी प्रस्तुतियाँ देते हुए कोशिश यही रही कि उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद किया जाए। संख्या पर ध्यान न देकर गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। पुस्तकों की संख्या भले ही कम हो परंतु पुस्तकों का चयन अच्छा होना चाहिए। अनुवाद कार्य सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने दिल के सकुन के लिए किया। पैसों के लिए कभी नहीं। सिर्फ अनुवाद करना है इसलिए कोई भी काम हाथ में ले लिया जाए, ऐसा भी नहीं किया। उसी पुस्तक के लिए हाँ कही, जिसके लिए दिल ने रज़ामंदी दी। यानी दिल से उसे एन्जॉए भी किया। पेशेवर तौर पर काम करना स्वीकार नहीं किया कि चलो पारिश्रमिक तो मिलना ही है कुछ भी कर लो। तिस पर भी गद्य में ही मन ज़्यादा रमता है पद्य के मुकाबले।

       बचपन में पिता हमेशा हम बच्चों को पढ़ाई को महत्ता देने की बात कहते। कोर्स से इतर पुस्तकें पढ़ने या रेडियो सुनने तक की इजाज़त नहीं थी, कोर्स की ही किताबें पढ़ने की ताकीद की जाती। यह भी संयोग है कि बचपन में जिन कार्यों की मनाही थी, बाद में बड़े होने पर वही क्षेत्र काम का हिस्सा बना। अफ़सोस है कि ईश्वर ने पिता को इन उपलब्धियों को देखने का मौक़ा ही नहीं दिया। उन्होंने बस अख़बारों और पत्रिकाओं में कहानियों के अनुवाद और आलेख छपते ही देखे सिर्फ तीन-साढ़े तीन साल तक। हाँ, माँ मेरी हर प्रकाशित रचना की पहली पाठक रही हैं। उन्होंने मुझे इस क्षेत्र में हर संभव सपोर्ट दिया।

       

अनूदित पुस्तकों की सूची –

1. फूलों का साथ   (उपन्यास)   -   करतार सिंह दुग्गल    -      पंजाबी से हिन्दी।
2. सुरों के सौदागर (रेखाचित्र)    -   इकबाल माहल        -      पंजाबी से हिन्दी।
3. पवित्र पापी  (उपन्यास)       -   नानक सिंह          -      पंजाबी से हिन्दी।
4. लाल बत्ती   (उपन्यास)      -      बलदेव सिंह       -      पंजाबी से हिन्दी।
5. अध खिला फूल (उपन्यास)    -      नानक सिंह       -       पंजाबी से हिन्दी।
6. कश्ती और बरेता            -      मोहन काहलों     -       पंजाबी से हिन्दी।
7. काबुलीवाले की बंगाली बीवी    -   सुष्मिता बंद्योपाध्याय    –   बांगला से हिन्दी।
8. तालिबान अफ़गान और मैं     -   सुष्मिता बंद्योपाध्याय    –   बांगला से हिन्दी।
9. एक अक्षर भी झूठा नहीं       -  सुष्मिता बंद्योपाध्याय     –   बांगला से हिन्दी।
10. सत्ताइस दिन तितली के (काव्य संग्रह)  – सुव्रतो दास       -   बांगला से हिन्दी।
11. गोधूलि गीत  (उपन्यास)    -     समीरण गुहा           -   बांगला से हिन्दी।
12. दहकते अंगारे (नाटक)      –     रिफ़त शमीम           –   उर्दू से हिन्दी।
13. ढिंबरी टाइट  ( कथा संग्रह)  –     तेजेंद्र शर्मा            –    हिन्दी से पंजाबी।

प्रकाशनाधीन (प्रेस में) –

1. आरती (काव्य संग्रह)          – शिव बटालवी       –   पंजाबी से बांगला में लिप्यांतरण।
2. हवा, हवा हूँ मैं   (उपन्यास)    – दलीप कौर टिवाणा  –   पंजाबी  से हिन्दी।
  3. गाथा तिस्ता पार दी (वृतांत्मक) –  देवेश राय         –   बांगला से पंजाबी।





































सोमवार, सितंबर 29, 2014


हिन्दी पखवाड़े का आयोजन 



पूर्ति तथा निपटान निदेशालय, कोलकाता में 8 से 22 सितंबर तक हिन्दी पखवाड़े का आयोजन किया गया। इस दौरान निबंध लेखन, टिप्पण आलेखन, सुलेख, श्रुत लेखन तथा स्लोगन लेखन आदि विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। निबंध का विषय था - च्चतर शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की समस्या तथा स्लोगन का विषय था स्वच्छ भारत। प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी निभाई। 22 सितंबर को समापन समारोह के अवसर पर पुरस्कार वितरण व काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। 

श्रीमती गीता बिश्वास ने पुष्प गुच्छ द्वारा अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के आरंभ में श्रीमती रत्ना चक्रवर्ती ने कविता आवृत्ति प्रस्तुत की। तत्पश्चात् पुरस्कार वितरण के तहत् विजेता प्रतिभागियों को निदेशक, श्री उमेश चंद्र ने नकद पुरस्कार व प्रमाणपत्र प्रदान कर उनकी हौंसला अफज़ाई की। 

काव्य गोष्ठी में रवि प्रताप सिंह ने कविताओं और ग़ज़लों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। ग़ज़लों के साथ-साथ उनकी दबे पाँव कब आ गई जवानी कविता बेहद सराही गई। 

जवानी कब दबे पाँव आती है और कब चुपके से चली जाती है पता ही नहीं चल पाता। इसी अहसास को बयां करती रवि प्रताप सिंह की इस कविता की बानगी कुछ यूं थी




विहसता सवेरा,
सिसकता अंधेरा,
जहाँ स्नेह देखा, दिया डाल डेरा,
आहत हृदय की,
यही है कहानी,
दबे पाँव कब आ गई थी जवानी।
वो छोटी कटोरी,
वो रिश्तों की डोरी
वो भाभी का घूंघट,
वो पनघट की गोरी
कमर पर घड़ा,
और छलकता वो पानी
दबे पाँव कब आ गई थी जवानी।


             


ग़ज़ल 


नूर बन कर बिखर गया होता |
तुम जो मिलते संवर गया होता |
इतनी दुश्वारियां नहीं होतीं,
वक्त हँसकर गुजर गया होता |
एक मुद्दत से दिल पे काबिज है,
दर्द जाने किधर गया होता |
धूप मे कब से चल रहा हूँ मै,
छाँव पाकर ठहर गया होता |

रश्क से चाँदनी सुलग जाती, 
रवि' फलक पर निखर गया होता
|
--   (रवि प्रताप सिंह)


रावेल पुष्प जी ने देश के मौजूदा हालातों का चित्रण करते हुए अपनी चुटीली व्यंग्य रचनाओं से सबका मनोरंजन किया। एक कविता की बानगी देखें - 

ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना,
पाँव बख्शे हैं तो तौफ़ीके सफर भी देना।
गुफ्तगु तूने सिखाई है ऐ रब ! वर्ना मैं तो गूंगा था
अब मैं बोलूंगा तो बातों में असर भी देना।

-- (रावेल पुष्प)



कार्यक्रम बेहद सराहा गया।  कार्यक्रम का कुशल संचालन नीलम शर्मा 'अंशु' ने किया। शत्रुघ्न दुबे ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 


कार्यक्रम की झल्कियां

































प्रस्तुति  -  नीलम शर्मा 'अंशु


मंगलवार, अप्रैल 08, 2014

"सिर्फ अपने गीतों की सशक्तता की वजह से ही 
वे आज भी लोकप्रिय हैं और लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।"


कल 7 अप्रैल की शाम शहर में इबादत फांउडेशन द्वारा ‘कविराज शैलेंद्र – रहेंगी अपनी निशानियां’  कार्यक्रम की दिलकश प्रस्तुति की गई।  कविराज शैलेंद्र के सफ़र को मनमोहक अंदाज़ में दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। पता ही नहीं चल पाया कि ढाई घंटे कैसे बीत गए। सुप्रिया जोशी, आनंद बहल, प्रियंका मित्रा, नवीन आनंद, सर्वेश मिश्रा आदि गायकों ने समां बाँध दिया। सर्वेश जब गा रहे थे तो यूं लग रहा था कि मानों रफ़ी साहब गा रहे हों बैकग्राउंड में। कभी ऐसा लगा कि हम आँखें बंद किए रेडियो या सी डी प्लेयर पर रफी साहब को सुन रहे हों। सचमुच, गीत-संगीत की इस निर्झर धारा में सिर्फ़ और सिर्फ़ आनंद ही शामिल था। एक बेहतरीन शाम का नज़राना...... 

इस मौके पर शैलेंद्र साहब के छोटे सुपुत्र श्री दिनेश शंकर शैलेंद्र जी से यह पूछे जाने पर कि आपके बाबा के निधन के इतने बरसों बाद आज क्या आप महसूस करते हैं कि उनका सही आकलन हो पाया है, के जवाब में उन्होंने कहा कि "उनका सही आकलन तो नहीं हो पाया। लोगों ने बहुत कोशिशें कीं उनके नाम को नीचा करने की। लोगों को पद्मश्री और पद्मभूषण मिलते हैं लेकिन उन्हें तो सरकार की तरफ से ऐसा कोई अवॉर्ड नहीं मिला। उनका कोई सपोर्ट नहीं था, वे लॉबी करने वालों में नहीं थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो बिहार, जहाँ के हम मूलत:  हैं और न ही उ. प्र. की सरकारों ने उनके लिए कुछ किया। सिर्फ अपने गीतों की सशक्तता की वजह से ही वे आज भी लोकप्रिय हैं और लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।"




                                                                                                                                                                                               

गुरुवार, फ़रवरी 20, 2014

बहुत याद आएंगे आप मलय दा (मलय साहा).....

श्री मलय साहा ( 1 नवंबर 1938 - 5 फरवरी 2014)


आकाशवाणी एफ.एम. बांगला  के प्रस्तोताओं के उद्गार।



29-02-2014 - आज आकाशवाणी के ड्यूटी ऑफिसर मलय दा (साहा) के श्राद्ध की रस्म थी। विगत 5 फरवरी, 2014 को रात्रि 11.45 पर उनका निधन हो गया था।  हार्ट सर्जरी के लिए वे अस्पताल में भर्ती हुए थे और फिर उनकी घर  वापसी नही हो पाई। उनके परिवार से मिल कर आज अच्छा लगा। उनकी श्रीमती जी ने अचानक कहा, अरे तुम्हारी आवाज़ तो ऐसी लगती है कि जैसे कोई बच्ची बात कर रही हो। (हलाँकि मुझे ऐसा नहीं लगता)।

विगत तीन वर्षों से मेरी ड्यूटी उन्हीं के साथ पड़ती थी। वे पूरे ध्यान से मन लगा कर प्रोग्राम की मॉनिटरिंग करते थे। हमेशा उनकी फ्लास्क में चाय भरी रहती। वे हर प्रस्तोता को चाय पिलाते। सबसे उनकी बहुत अच्छी बनती थी। आज का अद्भुत संयोग भी देखिए कि सुबह उनके श्राद्ध की रस्म में शिरकत की और शाम को एफ. एम. पर ड्यूटी भी थी। 

आप हमेशा हमें याद आते रहेंगे मलय दा। आपको हार्दिक श्रद्धांजलि। 

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आज ( 3 जनवरी, 2014) एफ. एम. रेनबो पर वर्ष 2014 की पहली ड्यूटी थी। प्रोग्राम का एपीसोड था - सिनेमा सिनेमा। हर शाम अलग-अलग विषय होते हैं। प्रोग्राम की समाप्ति पर स्टुडियो से निकल कर ड्यूटी रूम में आने पर ड्यूटी ऑफिसर मलय दा ने बांगला में कहा, खूब भालो होएछे। नीलम शर्मा के जे दिके ई दिए दाओ शेखाने ई "शोना"। (यानी बहुत बढ़िया हुआ। नीलम शर्मा को जिधर भी दे दिया जाए, उधर ही "सोना" (Sona नहीं Gold) मैंने हँस कर कहा, यानी जिस खांचे में भी डाल दो, हर जगह फिट। उन्होंने कहा - "नहीं, मैं तुम्हारे बारे में तुम्हारी तरह नहीं सोचता। मैं और भी बेहतर सोचता हूँ।" खैर, जो भी हो काम की सराहना हो - काम दूसरों को पसंद आए तो अच्छा लगता है कि मेहनत सफल रही। चलिए साल भर यूं ही अच्छा-अच्छा होता रहे।  कॉफी पीने के बाद निकलते वक्त मैंने कहा, अब लगभग दो हफ्तों बाद 21 जनवरी को मुलाक़ात होगी।

आज के प्रोग्राम को मैंने कई हिस्सों में बांट दिया था। पहले हिस्से में 2013 में गुज़री शख्सियतों को श्रद्धांजलि दी। दूसरे हिस्से में 5 सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियां, तीसरे हिस्से में 5 सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, चौथे हिस्से में 2013 में आए नए कलाकार, पाँचवे हिस्से में वर्ष 2014 की शुरूआत में जनवरी में रिलीज होने वाली उल्लेखनीय फ़िल्में। तो इस तरह 7-9 तक दो घंटों के संगीतमयी सफ़र की समाप्ति।

फिर आकाशवाणी से निकलते समय द्वार पर देखा दो व्यक्ति मुझसे पहले निकल रहे थे। वे कंट्रोल रूम वाले थे। एक ने मफलर से मुँह-सर लपेट रखा था, मैं पहचान नहीं पाई। उन्होंने ही खुद कहा, अरे हैप्पी न्यु ईयर। फिर हम लोगों ने साथ-साथ रोड क्रॉस की। जिन्होंने विश किया था, अचानक पूछा - आज क्या प्रोग्राम किया। मैंने कहा - सिनेमा सिनेमा। तो उन्होंने कहा, अच्छा उसमें वो कुछ ट्रिब्यूट टाइप का भी हो रहा था वही न। बहुत अच्छा प्रोग्राम हुआ, सचमुच। फिर साथ-साथ चलते रहे रोड पर। मैंने पूछा, आप लोग लोग कहाँ तक जाएंगे, उन्होंने कहा, मेट्रो तक। मैंने कहा, मैं भी मेट्रो स्टेशन ही जाउंगी। मेट्रो में भी जाकर पता चला कि हम तीनों एक ही रूट की ट्रेन पकड़ेंगे और वे मुझसे एक स्टेशन पहले उतरेंगे। कुल मिलाकर आकाशवाणी से लेकर मेट्रो तक 25 मिनटों का अच्छा वक्त गुज़र गया तरह-तरह की बातें करते हुए सफ़र में। 10 मिनट पैदल मार्च के और 15 मिनट ट्रेन के।


                                 
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 07-02-2014
नहीं पता था कि 3 जनवरी 2014 की मेरी ड्यूटी और बात-चीत मलय दा (मलय साहा) के साथ अंतिम साबित होगी। इसके बाद अंदमान ट्रिप पर चले जाने के कारण लौट कर अगली ड्यूटी 21, 23 और 26 को की। पता चला कि मलय दा अस्वस्थ हैं। हार्ट सर्जरी हुई है। इस दौरान उनकी ख़ैरियत जानने के लिए दो-तीन बार फोन किया लेकिन नो रिप्लाई। किसी ने उठाया ही नहीं। अब पाँच फरवरी को प्रो. वाले दिन ड्यूटी ऑफिसर शीला दी ने यूं ही पूछ लिया कि नीलम क्या मलय दा के बारे में कुछ लेटेस्ट जानकारी है। तो मैंने वही जवाब दिया कि फोन lतो नो रिप्लाई होता है हमेशा। उन्होंने भी यही बात कही। गलियारे में ही हमने पाँच-छह मिनटों तक बात की। मैंने उनसे कहा कि अगर आपको लेटेस्ट जानकारी हो तो बताईएगा, उन्हें देखने जाने का मन है। शीला दी ने भी कहा कि तुम भी बताना अगर तुम्हें जानकारी मिले तो। तब कहाँ पता था कि आज का दिन मलय दा अंतिम दिन होगा और वे सदा के लिए  निद्रा में समा जाएंगे, शायद तभी हमारा मन उस वक्त उन्हें याद कर रहा था। प्रो. के बाद घर आने पर अगली सुबह हमारी पेक्स मिताली जी का एस. एम. एस. मिला इस बारे में। बेहद अफ़सोस हुआ। फिर ऑफिस जाने पर शीला दा का फोन भी आया, तो उन्होंने कहा कि हाँ, देखो कल जब हम लोग उनके बारे में बात-चीत कर रहे थे तो उस वक्त वे विदा हो चुके थे और हमें पता भी नहीं था। दिल को दिल से राह होती है, शायद तभी उस वक्त हम लोग उनके बारे में बात कर रहे थे।

इंतज़ार था कि वे सेहतयाब होकर फिर से ड्यूटी पर लौटेंगे और काम का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। लेकिन हमेशा हमारे सोचने से क्या होता है, होता वही है जो ऊपर वाले ने सोच रखा होता है। मलय दा 1998 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके थे। इन दिनों आकाशवाणी से जुड़े हुए थे। बेटा उनका विदेश में इंजीनियर था, पिछले दिनों वे बता रहे थे कि उसने लड़की पसंद कर रखी है, कालीघाट का ही परिवार है, विदेश में उसके साथ ही काम करती है। अगली बार आएगा तो शादी कर देंगे। शायद इसकी मोहलत अभी उन्हें नहीं मिली।

वे मुझे एकमात्र ऐसे शख्स मिले जो प्रो. के बाद बेबाकी से अपनी राय दिया करते थे। उनकी फ्लास्क में चाय रखी रहती। चूँकि मैं चाय कम ही पीती हूँ तो वे प्रो. के बाद पूछा करते – ताहोले तुमी की एकटु चा/कॉफी खाबे। और मैं हामी भर देती। कभी-कभी देर होने के डर से शालीनता से मना भी कर देती कि आज नहीं। वे बेहद हंसमुख इन्सान थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा , ‘जानती हो कि मैंने शीला से (शीला दी) पूछा कि क्या तुमने वो गीत सुना है जो तुम्हारे नाम पर आजकल खूब बजता है। फिर खुद ही हंसकर कहा कि शीला मेरी बात समझ ही नहीं पाई।

वे पूरे ध्यान से पूरा प्रो. सुनते और शख्सीयत वाले प्रो. के दिन तो कभी-कभी स्टुडियो में आकर भी कहते कि क्या तुम अमुक गीत बजाओगी? (अगर तब तक वह गीत न बजा होता तो)। अगर वह गीत बजना बाकी होता तो मैं कहती कि बजेगा और अगर मेरी सूची में न होता तो मैं कहती, अगर आप कहते हैं तो बजा देती हूँ। कभी-कभी वे बांगला में छपा कोई बढ़िया सा आर्टिकल होता तो पकड़ा कर कहते, तुम्हारे लिए ले आया हूँ।

क्या पता था कि अंदमान का ट्रिप इन मायनों में भी यादगार बन जाएगा कि लौट कर किसी शख्स से यूं मुलाकात भी नहीं होगी। ख़ैर, देर-सबेर एक दिन सभी को वहाँ जाना है।  ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार को दु:ख के इन पलों में सहनशक्ति दे।

प्रस्तुति - नीलम शर्मा 'अंशु'









शुक्रवार, फ़रवरी 07, 2014


मलय दा को (मलय साहा) .......श्रद्धांजलि।


"आज ( 3जनवरी, 2014) एफ. एम. रेनबो पर वर्ष 2014 की पहली ड्यूटी थी। प्रोग्राम का एपीसोड था - सिनेमा सिनेमा। हर शाम अलग-अलग विषय होते हैं। प्रोग्राम की समाप्ति पर स्टुडियो से निकल कर ड्यूटी रूम में आने पर ड्यूटी ऑफिसर मलय दा ने बांगला में कहा, खूब भालो होएछे। नीलम शर्मा के जे दिके ई दिए दाओ शेखाने ई "शोना"। (यानी बहुत बढ़िया हुआ। नीलम शर्मा को जिधर भी दे दिया जाए, उधर ही "सोना" (Sona नहीं Gold)। मैंने हँस कर कहा, यानी जिस खांचे में भी डाल दो, हर जगह फिट। उन्होंने कहा - "नहीं, मैं तुम्हारे बारे में तुम्हारी तरह नहीं सोचता। मैं और भी बेहतर सोचता हूँ।" खैर, जो भी हो काम की सराहना हो - काम दूसरों को पसंद आए तो अच्छा लगता है कि मेहनत सफल रही। चलिए साल भर यूं ही अच्छा-अच्छा होता रहे।

फिर आकाशवाणी से निकलते समय द्वार पर देखा दो व्यक्ति मुझसे पहले निकल रहे थे। वे कंट्रोल रूम वाले थे। एक ने मफलर से मुँह-सर लपेट रखा था, मैं पहचान नहीं पाई। उन्होंने ही खुद कहा, अरे हैप्पी न्यु ईयर। फिर हम लोगों ने साथ-साथ रोड क्रॉस की। जिन्होंने विश किया था, अचानक पूछा - आज क्या प्रोग्राम किया। मैंने कहा - सिनेमा सिनेमा। तो उन्होंने कहा, अच्छा उसमें वो कुछ ट्रिब्यूट टाइप का भी हो रहा था वही न। बहुत अच्छा प्रोग्राम हुआ, सचमुच। फिर साथ-साथ चलते रहे रोड पर। मैंने पूछा, आप लोग लोग कहाँ तक जाएंगे, उन्होंने कहा, मेट्रो तक। मैंने कहा, मैं भी मेट्रो स्टेशन ही जाउंगी। मेट्रो में भी जाकर पता चला कि हम तीनों एक ही रूट की ट्रेन पकड़ेंगे और वे मुझसे एक स्टेशन पहले उतरेंगे। कुल मिलाकर आकाशवाणी से लेकर मेट्रो तक 25 मिनटों का अच्छा वक्त गुज़र गया तरह-तरह की बातें करते हुए सफ़र में। 10 मिनट पैदल मार्च के और 15 मिनट ट्रेन के।

आज के प्रोग्राम को मैंने कई हिस्सों में बांट दिया था। पहले हिस्से में 2013 में गुज़री शख्सियतों को श्रद्धांजलि दी। दूसरे हिस्से में 5 सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियां, तीसरे हिस्से में 5 सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, चौथे हिस्से में 2013 में आए नए कलाकार, पाँचवे हिस्से में वर्ष 2014 की शुरूआत में जनवरी में रिलीज होने वाली उल्लेखनीय फ़िल्में। तो इस तरह 7-9 तक दो घंटों के संगीतमयी सफ़र की समाप्ति।"

नहीं पता था कि 3 जनवरी 2014 की यह मेरी ड्यूटी और बात-चीत हमारे ड्यूटी ऑफिसर मलय दा (मलय साहा) के साथ अंतिम साबित होगी। इसके बाद अंदमान ट्रिप पर चले जाने के कारण लौट कर अगली ड्यूटी 21, 23 और 26 को की। पता चला कि मलय दा अस्वस्थ हैं। हार्ट सर्जरी हुई है। इस दौरान उनकी ख़ैरियत जानने के लिए दो-तीन बार फोन किया लेकिन नो रिप्लाई। किसी ने उठाया ही नहीं। अब पाँच फरवरी को प्रो. वाले दिन ड्यूटी ऑफिसर शीला दी ने यूं ही पूछ लिया कि नीलम क्या मलय दा के बारे में कुछ लेटेस्ट जानकारी है। तो मैंने वही जवाब दिया कि फोन lतो नो रिप्लाई होता है हमेशा। उन्होंने भी यही बात कही। गलियारे में ही हमने पाँच-छह मिनटों तक बात की। मैंने उनसे कहा कि अगर आपको लेटेस्ट जानकारी हो तो बताईएगा, उन्हें देखने जाने का मन है। शीला दी ने भी कहा कि तुम भी बताना अगर तुम्हें जानकारी मिले तो। तब कहाँ पता था कि इस वक्त मलय दा अंतिम यात्रा के लिए गहन निद्रा में समा चुके हैं, शायद तभी हमारा मन उस वक्त उन्हें याद कर रहा था। प्रो. के बाद घर आने पर अगली सुबह हमारी पेक्स मिताली जी का एस.एम.एस. मिला इस बारे में। बेहद अफ़सोस हुआ। फिर ऑफिस जाने पर शीला दा का फोन भी आया, तो उन्होंने कहा कि हाँ देखो कल जब हम लोग उनके बारे में बात-चीत कर रहे थे तो उस वक्त वे विदा हो चुके थे और हमें पता भी नहीं था। दिल को दिल से राह होती है, शायद तभी उस वक्त हम लोग उनके बारे में बात कर रहे थे। 
इंतज़ार था कि वे सेहतयाब होकर फिर से ड्यूटी पर लौटेंगे और काम का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। मलय दा 1998 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके थे। इन दिनों आकाशवाणी से जुड़े हुए थे। बेटा उनका विदेश में इंजीनियर था, पिछले दिनों वे बता रहे थे कि उसने लड़की पसंद कर रखी है, कालीघाट का ही परिवार है, विदेश में उसके साथ ही काम करती है। अगली बार आएगा तो शादी कर देंगे। शायद इसकी मोहलत अभी उन्हें नहीं मिली।
वे मुझे एकमात्र ऐसे शख्स मिले जो प्रो. के बाद बेबाकी से अपनी राय दिया करते थे। उनकी फ्लास्क में चाय रखी रहती। चूँकि मैं चाय कम ही पीती हूँ तो वे प्रो. के बाद पूछा करते - ताहोले तुमी की एकटु चा/कॉफी खाबे। और मैं हामी भर देती। कभी-कभी देर होने के डर से शालीनता से मना भी कर देती कि आज नहीं। वे बेहद हंसमुख इन्सान थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा , जानती हो कि मैंने शीला से (शीला दी) पूछा कि क्या तुमने वो गीत सुना है जो तुम्हारे नाम पर आजकल खूब बजता है। फिर खुद ही हंसकर कहा कि शीला मेरी बात समझ ही नहीं पाई। 
वे पूरे ध्यान से पूरा प्रो. सुनते और शख्सीयत वाले प्रो. के दिन तो कभी-कभी स्टुडियो में आकर भी कहते कि क्या तुम अमुक गीत बजाओगी? (अगर तब तक वह गीत न बजा होता तो)। अगर वह गीत बजना बाकी होता तो मैं कहती कि बजेगा और अगर मेरी सूची में न होता तो मैं कहती, अगर आप कहते हैं तो बजा देती हूँ। कभी-कभी वे बांगला में छपा कोई बढ़िया सा आर्टिकल होता तो पकड़ा कर कहते, तुम्हारे लिए ले आया हूँ। 
क्या पता था कि अंदमान का ट्रिप इन मायनों में भी यादगार बन जाएगा कि लौट कर किसी शख्स से यूं मुलाकात भी नहीं होगी। ख़ैर, देर-सबेर एक दिन सभी को वहाँ जाना है। 5 तारीख की शाम वे हमें अलविदा कह गए। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार को दु:ख के इन पलों में सहनशक्ति दे। 

नीलम शर्मा अंशु  (7-02-2014)