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शनिवार, सितंबर 18, 2010

दो कविताएं

दोस्तो, इस बार प्रस्तुत हैं श्री श्याम नारायण सिंह जी (धनबाद) की अलग-अलग आस्वाद लिए दो कविताएं।  




अहसास


तेरी झील सी गहरी आँखों में

इक प्यास हमने देखी है।

सपने में, फूल सा चेहरा तेरा
कल, उदास हमने देखा है।

तेरी अल्हड़ हरक़तों ने 
इस दिल में जगह पाई है
गुस्से में भींचना ओंठ तेरा
सच, अदा यह मुझे बहुत भाई है।

तुम न आना चाहो पास मेरे
यह तो मर्ज़ी है तेरी
पर तेरी यादों का साया
यहीं आस-पास हमने देखा है।

मुड़ मुड़ कर देखना और
धीरे से मुस्कराना तेरा
कैस बचें इन बेरहम नज़रों से
हर अंदाज़ है क़ातिलाना तेरा।

तेरी चुलबुली सी चहक से
खिल उठता है यह उपवन
क्योंकि तेरे आने से
आते मुधमास हमने देखा है।

क्यों तूने किसी का दिल 
तोड़ने की कसम खाई है
क्यों तू आ नहीं सकती
जब तेरी याद चली आई है। 

कौन कहता है कि तुम रोज़
इस महफ़िल से चली जाती हो
तेरे नहीं रहने पर भी यहाँ
रहने का अहसास हमने देखा है।

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प्यार की खुशबू



जो तुम्हें प्यार दे, तुम उन्हें प्यार दो
नफ़रतों से कटती नहीं ज़िंदगी
टूटने से बचा लो दिलों को यहाँ
खुदा की यही सच्ची है बंदगी। 


न कोई हिन्दु यहाँ न मुसलमा है
है खुदा जो वही सबका भगवान है
न बड़ा है न छोटा जग में कोई यहाँ
गर बड़ा है कोई तो वो इन्सां है
बढ़ाओ न तुम दिलों की दूरियां
प्रेम की गंगा में धो लो तुम यह गंदगी।


न मिटे कोई सलमा न सीता यहाँ
हो घर-घर कुरान और गीता यहाँ
समझा है जिसने प्यार को दोस्तो
उसी ने दिलों को है जीता यहाँ
छोड़ जाओगे तुम तो जहाँ को कभी
रह जाएगी बस तेरी सिर्फ़ सादगी।


क्यों लड़ें हम मंदिर मस्ज़िद के लिए
क्यों बहाएं खून अपनी ज़िद के लिए
आगे बढ़कर लगा लो गले से उन्हें
जैसे मिलते हो होली और ईद के लिए
हर आँगन में हो प्यार की खुशबू
प्यार ही तो सबसे बड़ी है खुशी।


न जाने हम क्यों वतन बांटते हैं
तन बांटते हैं , तन का कफ़न बांटते हैं
एक होने का सबब हमने सीखा नहीं
नई कलियों का हम चमन बांटते हैं
रहें सब यहाँ पर अमन चैन से
आसमां है ये सबका, है सबकी ज़मीं
प्यार ही तो है सबसे बड़ी खुशी।









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